यदि कांग्रेस सता मे आती है तो क्या क्या होगा
मैं ज्यादा तो कुछ नही कहूंगा ,लेकिन अगर किसी भी तरीके से (जोड़ तोड़ ,गठजोड़ ) upa को सरकार आ गयी समझो ,तो ये पक्का समझ लेना कि जम्मू और कश्मीर भारत से अलग हो कर रहेगा।
क्युकि आप सोचो कि इस चुनावी माहौल में दौनों अब्दुल्ला बाप और बेटे ने भरी सभा मे कहा है कि अल्लाह ने चाहा तो हम एक बार फिर जम्मू-कश्मीर मे अलग प्रधान-मंत्री और राष्ट्रपति लाकर रहेंगे। इस बात का क्या मतलब हो सकता है आप खुद ही समझदार है।
क्युकि सन 1953मे नेहरु द्वारा दी गयी विशेष छूट जिसमे धारा 370, artical 35A , जम्मू का अलग कानून, जम्मू का अलग प्रधान-मंत्री ओर राष्ट्रपति इत्यादी कई ऐसे गैर जरूरी वादे जो जम्मू को दिये गये थे वो भी बिना किसी सदन मे पारित किये । नेहरु ने राष्ट्रपति डॉ,राजेन्द्र प्रसाद पर दबाव बनाया कि आप एक शपथ पत्र पर लिखकर दो जिसमे उपरोक्त सारी शर्ते mention हो। तब राजेन्द्र प्रसाद जी ने मना भी किया था लेकिन नेहरु ने कहा कि या तो तुम लिखकर दे दो नही तो मे कोन्ग्रेस के अधिवेसन मे पारित करवा लूंगा । तब राजेन्द्र प्रसाद ने दबाव मे ये सब लिखकर दिया था। जिसे असंवैधानिक तरीके से सविधान मे जोडा गया। असंवेधानिक मतलब , ऐसा कोई संविधान मे प्रावधान है ही नही कि कोई राष्ट्रपति सविधान मे सिर्फ एक शपथ पत्र से कोई कानून बना सके । अगर कोई ऐसा कानून राष्ट्रपति पारित करता भी है तो उसे 6महिने के अन्दर ही दोनो सदनों मे पारित करवाना पड़ता है। लेकिन इन सारे नियमो की धज्जियां उडाई गयी।
फिर ये सब कई सालों तक चलता रहा और बाद मे पण्डित दीन दयाल उपाध्याय के प्रयासों से ये प्रधान-मंत्री और राष्ट्रपति वाला कानून हटाना पड़ा । तब जाकर के जम्मू-काश्मीर आज भी भारत के साथ है।
इसके अलावा 1996मे अटल बिहारी वाजपेयी जी के द्वारा ये कहा गया की जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है तब जाकर के ये देशद्रोही कुछ शान्त बैठे। लेकिन अब फिर से एक बार अपना सिर उंचा कर रहे है।
क्युकि आप सोचो कि इस चुनावी माहौल में दौनों अब्दुल्ला बाप और बेटे ने भरी सभा मे कहा है कि अल्लाह ने चाहा तो हम एक बार फिर जम्मू-कश्मीर मे अलग प्रधान-मंत्री और राष्ट्रपति लाकर रहेंगे। इस बात का क्या मतलब हो सकता है आप खुद ही समझदार है।
क्युकि सन 1953मे नेहरु द्वारा दी गयी विशेष छूट जिसमे धारा 370, artical 35A , जम्मू का अलग कानून, जम्मू का अलग प्रधान-मंत्री ओर राष्ट्रपति इत्यादी कई ऐसे गैर जरूरी वादे जो जम्मू को दिये गये थे वो भी बिना किसी सदन मे पारित किये । नेहरु ने राष्ट्रपति डॉ,राजेन्द्र प्रसाद पर दबाव बनाया कि आप एक शपथ पत्र पर लिखकर दो जिसमे उपरोक्त सारी शर्ते mention हो। तब राजेन्द्र प्रसाद जी ने मना भी किया था लेकिन नेहरु ने कहा कि या तो तुम लिखकर दे दो नही तो मे कोन्ग्रेस के अधिवेसन मे पारित करवा लूंगा । तब राजेन्द्र प्रसाद ने दबाव मे ये सब लिखकर दिया था। जिसे असंवैधानिक तरीके से सविधान मे जोडा गया। असंवेधानिक मतलब , ऐसा कोई संविधान मे प्रावधान है ही नही कि कोई राष्ट्रपति सविधान मे सिर्फ एक शपथ पत्र से कोई कानून बना सके । अगर कोई ऐसा कानून राष्ट्रपति पारित करता भी है तो उसे 6महिने के अन्दर ही दोनो सदनों मे पारित करवाना पड़ता है। लेकिन इन सारे नियमो की धज्जियां उडाई गयी।
फिर ये सब कई सालों तक चलता रहा और बाद मे पण्डित दीन दयाल उपाध्याय के प्रयासों से ये प्रधान-मंत्री और राष्ट्रपति वाला कानून हटाना पड़ा । तब जाकर के जम्मू-काश्मीर आज भी भारत के साथ है।
इसके अलावा 1996मे अटल बिहारी वाजपेयी जी के द्वारा ये कहा गया की जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है तब जाकर के ये देशद्रोही कुछ शान्त बैठे। लेकिन अब फिर से एक बार अपना सिर उंचा कर रहे है।
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